भारतीय कृषि का वैष्वीकरण

 

अर्चना सेठी, बी. एल सोनेकर

1सहायक प्राध्यापक, अर्थषास्त्र अध्ययन षाला, प्ंा रविषंकर षुक्ल विष्वविद्यालय रायपुर.

2सह प्राध्यापक, अर्थषास्त्र अध्ययन षाला, प्ंा रविषंकर षुक्ल विष्वविद्यालय रायपुर.

*Corresponding Author E-mail: archanasethi96@gmail.com

 

ABSTRACT:

जब भी सरकार विदेषी कंपनियों को भारत के किसी भी क्षेत्र में पंूजी लगाने की अनुमति देती है तो पहले यह सुनिष्चित कर ले कि विदेषी कंपनी निवष से जो लाभ कमाती है उसका भारत के विकास में भी एक निष्चित योगदान हो यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार को यह अनुमति नहीं देनी चाहिए।

 

KEYWORDS: वैष्वीकरण, बहुराष्ट्रीय निगम, कृषि उत्पाद।

 

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वैष्वीकरण के अंतर्गत भारत सरकार ने दो प्रमुख प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित किया हैः 1. भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विदेषी पंूजी का निवेष 2. भारत के विदेषी ब्यषपार को विष्व व्यापार संगठन के अनुसार नियमित करना।इस अध्ययन में हम भारतीय कृषि के विकास में विदेषी पंूजी की भूमिका का अध्ययन करेंगे जो प्रायः बहुराष्ट्रीय निगमों द्धारा लगायी जाती हैः

 

अध्ययन का उददेष्य:

1 भारतीय कृषि पर वैष्वीकरण के प्रभाव का अध्ययन करना।

2. कृषि में विदेषी पंूजी के निवेष का अध्ययन करना।

 

भारतीय कृषि और विष्व व्यापार संगठन

ब्रेटनवुडस समझाौते के परिणामस्वरुप अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विष्वबैंक और कुछ समय बाद सीमाषुल्क और और ब्यापार पर सामान्य समझौते के अंतर्गत ब्यापार और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा प्रणाली को नियंत्रित करने के लिए एक प्रणाली की स्थापना की गई। 15 अप्रेल 1994 को मोरक्को के मारकेष में 124 देष एकत्र हुए और सीमा षुल्क और ब्यापार पर सामान्य समझौते पर हस्ताक्षर किये। इस समझौते का मुख्य उद्देष्य सीमा षुल्क घटाना, कोटा कम करना, बहुपक्षीय विष्व ब्यापार को बढावा देना था। विष्व ब्यापार संगठन या ॅज्व्1 अप्रेल 1995 से प्रचलन में है। विष्व ब्यापार संगठन की प्रस्तावना के अनुसार विकासषील देष विषेषकर पिछडे देष अंतर्राष्ट्रीय ब्यापार की वृद्धि में वह भाग प्राप्त कर सके जो उनकी आर्थिक विकास संबंधी आवष्यकताओं के अनुरुप हो। ळ।ज्ज् का स्थान  ॅज्व् ने ले लिया है। ॅज्व्  विष्व ब्यापार को बढावा  देगा। यह विष्व के विभिन्न देषों के बीच अंतर्राष्ट्रीय ब्यापार ब्यापार को प्रोत्साहित करने तथा सीमा षुल्क के बंधनों को कम करने किया गया बहुपक्षीय और बंधनमुक्त संगठन है।

 

युरग्वे दौर में समझाौते में 2631 दिन लगे एवं 120 से अधिक देषों ने भाग लिया हजारों वादविवाद हुआ।15 अप्रेल 1994 को इस पर हस्ताक्षर हुआ। इस समझौते के आधार पर ॅज्व् की स्थापना हुई 1 जनवरी 1995 से कार्य करना प्रारंभ कर दिया। भारत को ॅज्व् का संस्थापक सदस्य माना जाता है।

 

विष्व व्यापार संगठन या ॅज्व् का उद्देश्य ;व्इरमबजपअमे िॅज्व्द्धरू

विष्व व्यापार संगठन के निम्नलिखित उद्देष्य हैः

1. नई विष्व व्यापार प्रणाली को लागू करना।

2. विष्व व्यापार को इस विधि से बढावा देना कि प्रत्येक देष लाभान्वित हो।

3. खुली विष्व व्यापार प्रणाली की सभी बााधाओं को दूर करना।

4. उपभोक्ताओं के लाभ के लिए सभी व्यापारिक भागीदारी में प्रतियोगिता को बढावा देना।

5. विष्व में रोजगार के स्तर को बढाने उत्पादन तथा उत्पादकता के स्तर को बढाना।

6. संसार के संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना।

7. सुसार की जनसंख्या के जीवन स्तर को बढाना।

8. सभी सदस्य देषों के आर्थिक विकास की गति को तेज करना।

 

डण्केल डाफ्ट ;क्नदामस क्तंजिद्धरू

1991 में गैट के महानिर्देषक श्री डंकेल द्धारा एक दस्तावेज पेष किया गया। इस दस्तावेज में गैट के सदस्य देषों की बातचीत के परिणामस्वरुप जिन विषयों पर समझाौता हो गया था। उनका उल्लेख था और जहां मतभेद बने हुए थे। वहां समझाौते के प्रस्ताव थे। अधिकांष विकासषील देष डंकेल प्रस्तावों के आधार पर युरुग्वे दौर की बातचीत को समाप्त करने  तथा समझाौता करने को तैयार थे ,लेकिन अमेरिका तथा यूरोपीय आर्थिक समुदाय के बीच कृषि तथा अन्य कुछ विषयों पर मतभेद के कारण समझाोते में समस्या थी। अंत में डंकेल डाªफ्ट पर वार्ता का अंतिम दौर 15 दिसंबर 1993 के जेनेवा में पूर्ण हुआ। यह भी निष्चित किया गया कि अप्रेल 1994 मे इन प्रस्तावों पर सभी देष हस्ताक्षर करेंगे। इस बीच अमेरिका तथा अन्य दो देषों ने सामाजिक लागत को माध्यम बनाकर कि विकासषील देषों में सस्ते श्रम  के कारण किसी भी सामान का आयात करते समय अपने देष में श्रम की कीमत के बराबर षुल्क लगा दिया जाये। साथ ही वे पर्यावरण एवं मानवाधिकार को भी ब्यापार से जोडने के पक्ष में थे। अंत में यह फैसला हुआ कि इन मसलों पर बाद में विचार होगा। डंकेलप्रस्ताव पर मोरक्को की राजधानी मारकेष में हुईं गैट सभा में 125 देषों के मंत्रियों ने 15 अप्रेल 1994 को हस्ताक्षर किये। यह समझाौता 1995 से लागू हुआ तथा गैट के स्थान पर एक नई संस्था विष्व व्यापार संगठन स्थापना हुई।इसी के साथ विष्व ब्यापार में नये युग का श्री गण्ेाष हुआ।

 

विष्व ब्यापार संगठन का क्षेत्र ; ।तमं िॅज्व्द्धरू

गैट का संबंध प्राथमिक तैयार वस्तु थी। यह पहला बहुपक्षीय समझौता है जिसमें जिसमें सेवाओं के ब्यापार को प्रगतिषील उदारीकरण किया गया है। विष्व ब्यापार संगठन का क्षेत्र गैट की तुलना में ब्यापक है। इसमें उन क्षेत्रों को भी षामिल किया गया है जो वस्तुओं की उत्पादन क्रिया में षामिल होते है। कृषि जैसे विवादग्रस्त विषय को शामिल किया गया है और अन्य विषय को षामिल किया गया है वह निम्न हैः

1. ब्यापार से संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकार।

2. ब्यापार से संबंधित निवेष उपाय।

3. सेवाओं में ब्यापार पर सामान्य समझौता।

 

विष्व ब्यापार संगठन तथा कृषि ब्यापार समझौता ;ॅवतसक  ज्तंकम  व्तहंदपेंजपवद ंदक ।हतपबनसजनतंस  ज्तंकम ।हतममउमदजेद्धरू

कृषि 40 वर्षों तक गैट से अलग रहा है। युरुग्वे दौर में कृषि को विष्व ब्यापार संगठन क्षेत्र में लाया गया। कृषि पदार्थों के लिए बडी बाजार पहुंच, सभी गैर षुल्क उपायों को सीमा षुल्कीकरण में षामिल किया जाये। इसमें उन वस्तुओं का अपवाद है जिसके लिए विषेष ब्यवहार या उपचार का समझाौता किया गया है और कृषि पदार्थों पर सारे सीमा करों की बाध्यता है। इस प्रकार परिवर्तित होने वाले उपायों में वारूतव में सभी गैर सीमा षुल्क उपाय षामिल होते है जैसे परिमाणात्मक आयात प्रतिबंध, परिवर्तनषील आयात लगाना, न्यूनतम आयात कीमतें, विवेकपूर्ण आयात लाइसेंस और गैर सीमा षुल्क उपाय, जो राज्य ब्यापार उद्यमों और स्वैच्छिक निर्यात नियंत्रणों द्धारा बनाये रखे जाते है। इसमे परिणामस्वरुप कृषि पदार्थों में ब्यापार की सुरक्षा पहली बार औद्योगिक उत्पाद की तुलना में अधिक होगी क्योंकि कृषि पदार्थों की सीमा षुल्क रेखा षत प्रतिषत बाध्य होगी सभी वाद विवाद में कृषि सबसे अधिक विवादग्रस्त है। मुख्य बातें निम्नलिखित हैः

 

1.घरेलू समर्थन ;क्वउमेजपब ैनचचवतजद्धरू

सभी देषों को घरेलू समर्थन कीमतों को कम करना होगा। यदि यह उत्पादन के कुल मूल्य से 5 प्रतिषत से अधिक है परन्तु अल्पविकसित देषों के मामले में 10 प्रतिषत मूल्य से अधिक है। यदि समर्थन के लिए कुल उपाय 10 प्रतिषत से अधिक हो जाता है तब इसे 10 वर्षाों के लिए यु.एस.. डालर या घरेलू करेंसी में 13.3 प्रतिषत तक कम करना होगा,परन्तु अल्पविकसित देषें को इसे 6 वर्षों के लिए 20 प्रतिषत तक कम करना होगा। गैर सीमा षुल्कों को भी आयात निर्यात करों द्धारा प्रतिस्थापित करना होगा।

 

2. निर्यात प्रतियोगिता ; म्गचवतज ब्वउचमजपजपवदद्धरू

विष्व ब्यापार संगठन के बनाये नियम कार्यविधि वस्तु बाजार में प्रतियोगिता बढाती है और नियमित ब्यवस्थाओं के बीच प्रतियोगिता को बढाना भी है। किसी भी नीति का आधारभूत अंग ब्यापार उदारीकरण है जो इस चीज के लिए आष्वस्त करता है कि प्रतियोगिता पूर्ण है। ब्यापार बाधाओं की समाप्ति कम लागत विधि की तुलना मेंअध्कि प्रभावशाली है। इससे प्रतियोगिता बढती है।

 

बाजार पहुंच ;डंतामज ।बबमेेद्धरू

विष्व ब्यापार संगठन नियमों का प्रावधान करता है और और प्रषासन भी करता है। ब्यापार अवरोध को समाप्त करके तथा भेदभाव को समाप्त करके घरेलू उपाय एवं नीतियों द्धारा बाजार पहुंच को सुधारा जाता हैः 1. सीमा करों को कम करने की बाध्यता निर्यातकों को बाजार पहुंच को काफी सुधारा जाता है। 2.विष्व ब्यापार संगठन में गैट सीमा षुल्क उपाय मूल्य अनुसार वनज अनुसार या विषिष्ट सीमा षुल्कों मे बदलते है। 3.परिणामित सीमा षुल्क 6 वर्षों तक धीरे धीरे कम किया जाता है। 4.निवेष सहायता कृषि को उपलब्ध है और कृषि सहायता निम्न आय या कम संसाधन उत्पादकों को उपलब्ध है। अल्पविकसित देषों को यह सहायता कम करने की आवष्यकता नहीं और विकसित देषों को यह विकल्प उपलब्ध नहीं। 5. वास्तविक सीमा षुल्क बाघ्य दर से कम हो सकता है परन्तु इसे तब तक ऊंचा नहीं किया जा सकता जब तक दर निष्चित करने का समझाौता ब्यापारिक भागीदारों से नहीं हो सकता। 6. अल्पविकसित देषों को अधिक अनुकूल ब्यवहार दिया गया हैअल्पविकसित देषों को समय अवधि 6 से बढाकर 10 वर्ष कर दिया गया है। 7. सबसे कम अल्पविकसित देषों को किसी भी प्रकार की कटौती करने की आवष्यकता नहीं है। उन्हें गैर सीमाषुल्क उपायों को बनाये रखने के लिए निषेधित भी किया जाता है। 7.बाजार पहुंच को सुधारने के लिए औद्योगिक 6 वर्ष के अंदर सीमा शुल्क में 36 प्रतिषत कटौती करने की आवष्यकता है जबकि  अल्पविकसित देषों को यह कटौती 10 वर्षौं के अंदर 24 प्रतिषत करनी होगी।

 

इसके अतिरिक्त विष्व ब्यापार संगठन कपडा क्षेत्र में ब्यापार, ब्यापार से संबंधित बौद्धिक संपदा के अधिकार , ब्यापार से संबंधित निवेष उपाय ,सेवाओं में ब्यापार पर सामान्य समझाौता ,विवाद निबटारा तथा ब्यापार नीतियों का अनुवीक्षण या मानीटर करना आदि कार्यों में अधिकाधिक भागीदारी निभाता है।

 

आर्थिक उदारीकरण और कृषि पर इसका प्रभाव ;म्बवदवउपब स्पइमतंसपेंजपवद ंदक पजे पउचंबज वद ।हतपबनसजनतमद्धरू

आर्थिक उदारीकरण को भारत ने 1991 से अपनाया तब से भारत विकास के मार्ग पर निकल गया है। आर्थिक उदारीकरण द्धारा सरकारी हस्तक्षेप को दूर करने के बहुत सारे प्रयास किया गया है तथा निजीकरण को बढावा दिया गया है। साथ ही भारतीय कृषि को बहुत सारे चुनौतियों का सामना करना पड रहा है।

 

आर्थिक उदारीकरण का कृषि पर निम्नलिखित प्रभाव हैः

1.खाद्यान्न के उत्पादन में वृद्धि ;प्दबतमंेम पद जीम च्तवकनबजपवद िथ्ववकहतंपदेद्धरू

आर्थिक उदारीकरण के बाद से .खाद्यान्न के उत्पादन में निरंतर वृद्धि हो रही है। 70 के दषक में कृषि उत्पादन में वृिद्ध दर 2.08 प्रतिषत थी एवं 80 के दषक में 3.5 प्रतिषत हो गया लेकिन 90 के दषक में यह गिरकर 1.7 प्रतिषत हो गया। यह निष्चित किया गया कि खाद्यान्न आवष्यकता को पूरा करना है और निर्यात भी करना है तो कृषि उत्पादन वृिद्ध दर 4 प्रतिषत होना चाहिए।

 

2. कृषि का विविधीकरण ;क्पअमेपपिबंजपवद ि।हतपबनसजनतमद्धरू

आर्थिक उदारीकरण के बाद से केवल खाद्यान्न उत्पादन वरन ब्यापारिक एवं बागवानी उत्पादन में भी बढोतरी हुई है। इन वस्तुओं की मांग में निरंतर वृद्धि हो रही है। इस प्रकार कृषि का विविधीकरण हुआ है।

 

3. बागवानी उत्पादन में वृद्धि ;प्दबतमंेम भ्वतजपबनसजनतम च्तवकनबजद्धरू

विविध जलवायु, मिटटी, आदि के कारण भारत में अनेक बागवानी उत्पादन फल, सब्जी, मसाला, काजू, गिरी आदि के उत्पादन मेंआर्थिक उदारीकरण के बाद से वृद्धि हुई है। फल के उत्पादन में भारत का प्रथम एवं सब्जी के उत्पादन में द्धितीय स्थान है।

 

4. कृषि निर्यात मेंवृद्धि ; प्दबतमंेम ।हतपबनसजनतंस च्तवकनबजेद्धरू

आर्थिक उदारीकरण के बाद से केवल कृषि उत्पादन में वृिद्ध हुई है वरन निर्यात में भी वृद्धि हुई है। 1998.99 तक कृषि निर्यात में 20 प्रतिषत तक वृद्धि हुई है।

 

5. कृषि संसाधनों की उत्पादकता में वृद्धि ;प्दबतमंेम च्तवकनबजपअपजल ि।हतपबनसजनतंस त्मेवनतबमेद्धरू

आर्थिक उदारीकरण के बाद से कृषि संसाधनों की उत्पादकता में वृद्धि हुई है। वर्तमान में नई तकनीक एवं संसाधनों के कुषलतम बंटवारे द्धारा संसाधनों की उत्पादकता में वृद्धि हुई है।

 

6. पिछडे क्षेत्रों में कृषि विकास ; क्मअमसवचपदह ।हतपबनसजनतम पद ठंबाूंतक ।तमंद्धरू

आर्थिक उदारीकरण के बाद से सभी फसलों में षोधकार्य हो रहा है इससे पहले गेहूं एवं चावल में ही होता था। जिसके कारण सिंचाई सुविधा, षुष्क कृषि संभव होने से एवं उच्च उत्पाकता वाले बीज आने से पिछडे क्षेत्रों में भी कृषि विकास हुआ है।

7. कृषि क्षेत्र में रोजगार के अधिक अवसर ;डवतम म्उचसवलउमदज व्चचवतजनदपजपमे पद ।हतपबनसजनतंस ैमबजवतद्धरू

हरित क्रंाति एवंकृषि यंत्रीकरण के बाद कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम हो गया है लेकिन आर्थिक उदारीकरण के बाद से पषुपालन, डेयरी, मुर्गीपालन बागवानी फूलों की खेती आदि से कृषि क्षेत्र में रोजगार के अधिक अवसर हो गया है।

 

 

8. कृषि क्षेत्र में निजी निवेष की बढती प्रवृत्ति ;ळतवूपदह ज्तमदक िचतपअंजम प्दअमेजउमदज पद ।हतपबनसजनतमद्धरू

आर्थिक उदारीकरण के बाद से कृषि क्षेत्र में निजी निवेष की प्रवृत्ति बढी है। 1960.61 में निजी निवेष का प्रतिषत 46.1 था जो 1997.97 में 79 प्रतिषत हो गया।

 

9. संस्थागत कृषि साख का बढना ;प्दबतमंेम प्देजपजनजपवदंस ।हतपबनसजनतंस ब्तमकपजद्धरू

आर्थिक उदारीकरण के बाद से कृषि क्षेत्र मेंसंस्थागत कृषि साख बढने लगा है। इससे पहले किसान महाजन और साहूकार से ऋण लेते थे परन्तु अब कम ब्याज दर पर बैंक से ऋण मिल जाता है।

 

10 खाद्य प्रक्रिया ;थ्ववक च्तवबमेेपदहद्धरू

आर्थिक उदारीकरण के पहले अनेक उत्पाद फल एवं सब्जी ओद नष्ट हो जाता था लेकिन आर्थिक उदारीकरण के बाद हानि से बचने राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड ने पेकिंग, भण्डारण तथा यातायात की सुविधा प्रदान किया है ंसरकार इन उत्पादों को कर मुक्त किया है एवं विदेषी पंूजी को आर्किषत करने वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

 

कृषि में विदेषी पंूजी के निवेष के तीन चरणः कृषि में विदेषी पंूजी के निवेष को तीन चरण में अध्ययन कर सकते है:

 

प्रथम चरणः

इस चरण में कृषि उत्पादन के साधनों जैसे खाद, बीज, कीटनाषक, दवाईयों , मषीनों आदि के निर्माण तथा विकास की प्रक्रिया षामिल हैं सिंचाई, बिजली तथा सडक निर्माण कार्य भी इस अवस्था में षामिल किया जा सकता है।

 

इस चरण में कोई भी विदेषी निगम खाद, बीज, कीटनाषक, दवाईयों, मषीनों आदि के निर्माण में निवेष नहीं करेगी क्योंकि सरकार पहले ही कीटनाषक तथा रासायनिक खाद के उपयोग को कम करने का प्रयास कर रही है। कुछ समय पहले तक आयात की जाने वाली रासायनिक खाद का मूल्य देष में उत्पादित रासायनिक खाद के लागत से कम था। ये सब बातें भारत में विदेषी कंपनियों को भारत मंे रासायनिक खाद के उत्पादन के लिए अपनी पंूजी लगाने से हतोत्साहित करेगी।

 

इसी प्रकार कृषि के लिए आवष्यक मषीनों के उत्पादन में भी कोई विदेषी कंपनी पंूजी नहीं लगायेगी क्योंकि कृषि के लिए आवष्यक मषीनों के उत्पादन में भारत केवल आत्मनिर्भर है वरन निर्यात भी करता है।

 

बीजों के अनुसंधान के लिए विदेषी पंूजी का निवेष की संभावना कम है क्योंकि अनुसंधान के क्षेत्र में लाभ की अनिष्तिता होती है। अनुसंधान असफल भी हो सकता है। फिर इस क्षेत्र में देष का अपना संगठन  बहुत अच्छे से कार्य कर रहा है।

 

बिजली तथा सडक निर्माण एक ऐसा क्षेत्र है जिसमे विदेषी पंूजी का निवेष हो सकता है यह 2 प्रकार से हो सकता है 1. या तो विदेषी कंपनी अपने ही साधनों से और बाद में सरकार से अपना लाभ सहित इसको बनाने का ब्यय प्राप्त कर ले लेकिन इसे सरकार द्धारा निवेष माना जायेगा। 2. बनाओ ,चलाओ तथा जाओ। एक कंपनी लंबी अवधि के लिए सडक या बिजली कंपनी बनाती है फिर इस कंपनी को उपयोग करने वालों से टोल वसूलने दिया जाता है और बिजली को निष्चित अवधि के लिए बेच सकती है। निर्धारित अवधि समाप्त होने पर सडक या बिजली कंपनी सरकार को दे देगी। इसमें भी विदेषी कंपनी को एक समस्या हीेगी कि सडक तथा बिजली जनसेवा है तथा इसका क्या मूल्य वसूल किया जाये एक विवाद का विषय है। विदेषी कंपनी विवाद से बचना चाहेगी। कोई भी कंपनी यह नहीं चाहेगी कि उनके उत्पाद का मूल्य कोई और निर्धारित करे।

 

सिंचाई एक ऐसा क्षेत्र है जिसमे विदेषी पंूजी का निवेष हो सकता है यह 2 प्रकार से हो सकता है 1. या तो विदेषी कंपनी अपने ही साधनों से नहर या बांध बनाये  और बाद में सरकार से अपना लाभ सहित इसको बनाने का ब्यय प्राप्त कर ले ,लेकिन इसे सरकार द्धारा निवेष माना जायेगा। इस क्षेत्र में बनाओ, चलाओ और जाओ की नीति नहीं अपना सकते क्योंकि बांधों तथा नहरों पर विदेषी कंपनी का नियंत्रण तथा कृषि के लिए अपनी मर्जी से पानी छोडने की स्वतंत्रता विदेषी कंपनी को नहीं दिया जा सकता।

 

इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रथम चरण में विदेषी पंूजी का निवेष होने की संभावना बहुत ही सीमित है।

 

द्धितीय चरण ; ैमबवदक ैजंहमद्धरू

दूसरा चरण फसलों के उत्पादन का चरण है विदेषी कंपनी भूमि खरीदकर कृषि कार्य कर सकती है भारत में अभी भी कुछ विदेषी कंपनी खय बागान के मालिक हैं। किंतु यह स्वतंत्रता से ले प्रारंभ की गई थी वर्तमन में ऐसा कठिन है क्योंकि सभी भूमि कृषि कार्य के अधीन गया है। विदेषी कंपनी को किसान से भूमि खरीदनी होगी यह कठिन कार्य है क्योंकि किसान सीमांत एवं लघु किसान हैं राज्य सरकार चाहे तो बलपूर्वक भूमि खरीदकर कंपनी को दे सकती है। इससे सरकार को विरोध का सामना करना पडेगा किसान यदि भूमि बेच भी देते हैं तो बाद में उसी कंपनी में श्रमिक के रुप में कार्य करना चाहेंगे तो भी कार्य नहीं मिलेगा इस प्रकार बेरोजगारी के डर से वे भूमि नहीं बेचेंगे।

 

इस प्रकार स्पष्ट है कि दूसरे चरण में विदेषी कंपनी की कोई भूमिका नहीं है।

 

तृतीय चरण ; ज्ीपतक ैजंहमद्ध रू

तीसरा चरण फसल की कटाई से प्रारंभ होता है। इस चरण में उपज कां मंडी में बेचना एवं फसलों पर आधारित उद्योग स्थापना की प्रक्रिया षामिल है। प्रथम प्रक्रिया मंडी में बेचने की एक कंपनी के लिए निम्न प्रक्रिया है जिसे वह नहीं करेगी। दूसरी प्रक्रिया फसल आधारित उद्योग स्थापना की। विदेषी कंपनियों को इन उद्योगों में निवेष की खुली छूट है। विदेषी कंपनी पटसन तथा रुई आधारित उद्योग में निवेष नहीं करेंगे क्योकि इन उद्योगों में भारत केवल आत्मनिर्भर है वरन निर्यात भी करता है।

 

कृषि उत्पादों के संसाधन में जुटे उद्योग एवं बहु.राष्ट्रीय कंपनियां ;डनसजपदंजपवदंस ब्वतचवतंजपवदे ंदक ।हतवचतवबमेेपदह प्दकनेजतपमेद्धरू

कृषि उत्पादों के संसाधन से आषय वे तकनीकि गतिविधियां जो प्राथमिक उत्पादों के स्वरुप में इस प्रकार के परिवर्तन लाती है कि वे उत्पाद खाद्य पदार्थ ,पषुओं के आहार या कच्चेमाल के रुप में उपयोग होता है। जैसे धान से चांवल निकालना, आटा पीसना फलों से जूस निकालना,मुरब्बा बनाना आदि सभी तीसरे चरण में षामिल है। इसे 2 भागों में बांटा जा सकता है। . खाद्य वस्तुओं का संसाधन . अखाद्य वस्तुओं का संसाधन।

 

जहां तक खाद्य वस्तुओं के संसाधन का संबंध है इसमें फल, सब्जियां, भैंस का मांस, मुर्गी पालन से प्राप्त उत्पाद, दूध मछली आदि षामिल है। सरकार ने इसमें 100 प्रतिषत निवेष की छूट दी है। भारतीय उद्योगपति भी इसमें काफी निवेष किये हे। इसकी प्रगति भी संतोषजनक है। फलों तथा सब्जियों के संसाधन का उद्योग वह क्षेत्र है जो इसमें पिछडा हुआ है।

 

फलों तथा सब्जियों के संसाधन उद्योग में विकास की आवष्यकता ;छममक वित जीम क्मअमसवचउमदज िथ्तनपज ंदक टमहमजंइसम च्तवबमेेपदह प्दकनेजतलद्धरू

भारत सरकार इस उद्योग को बहुत महत्व दे रही है। इसके अनेक कारण हैः

1. भारतीय जनता के खाने पीने के सम्मिश्रण में परिवर्तन हो रहा है। षहरीकरण के कारण प्रति ब्यक्ति आय में वृद्धि होने से दूध, मांस, फल एवं सब्जियों से बने उत्पाद का अनुपात बढते जा रहा है। फलों तथा सब्जियों का पर्याप्त संसाधन नहीं होने से इसका 40 प्रतिषत नष्ट हो जाता है। स्पष्ट है कि यदि संसाधन की पूर्ण ब्यवस्था हो तो 1. किसान एवं ब्यापारी हानि से बच जायेंगे। 2. रोजगार भी बढेगा। 3. किसानों की आय भी बढेगी। 4. विदेषी कंपनियां यदि ये उत्पाद देष के बाहर भेजेगी तो विदेषी मुद्रा की प्राप्ति होगी। 5. फसलों की विविधीकरण होगा 6. किसानों की आय में वृद्धि के साथ स्थिरता होगी। 6. विदेषी कंपनी गुणवत्ता बढाने उच्च तकनीक अपनाती है तो यदि लागत कम हो जाती है तो किसानों को भी इसे अपनाने से लाभ होगा।

 

अब तक के अनुभव  से स्पष्ट है कि यदि भारतीय उद्यमी इसमें निवेष नहीं करते हैं तो सरकार को स्वयं निवेष करना होगा या बाहरी स्रोत पर निर्भर रहना पडेगा।

 

बहु .राष्ट्रीय कंपनियां, सब्जियों तथा फलों का संसाधन तथा इनके उत्पादन के लिए इकरार की भूमिका ;डनसजपदंजपवदंस  ब्वतचवतंजपवदेए च्तवबमेेपदह िथ्तनपजे ंदक टमहमजंइसमे ंदक जीम  प्उचवतजंदबम िब्वदजतंबज थ्ंतउपदहद्धरू

यदि कोर्इ्र विदेषी कंपनी सब्जियों तथा फलों का संसाधन कार्य करती है इसके लिए आवष्यक हो जाता है कि कंपनी आष्वस्त हो जाये कि सब्जियों तथा फलों की पर्याप्त आपूर्ति होते रहेगी। इसके लिए किसान ओर कंपनी के बीच इकरार होगा जिसमें कंपनी यह सुनिष्चित करेगी कि किसान से उनकी सब्जियों तथा फलों को उचित मूल्य में खरीद लेगी एवं किसान यह सुनिष्चित करेगा कि वह कंपनी को सब्जियों तथा फलों की पूर्ति करते रहेगा। यह इकरार नामा लिखित होना चाहिए एवं यह भी स्पष्ट हो कि किसी भी पक्ष द्धारा यदि इकरार तोडा जाता है तो उसे क्या हर्जाना चुकाना पडेगा।

 

भारत में सब्जियों तथा फलों का संसाधन से जुडे  उद्योग में विदेषी कंपनियों द्धारा निवेष के विरोध में तर्क ;।तहनउमदजे ंहंपदेज प्दअमेजउमदज इल थ्वतमपहद ब्वउचंदपमे पद थ्तनपज ंदक टमहमजंइसम च्तवबमेेपदह प्दकनेजतलद्ध रू

भारत में सब्जियों तथा फलों का संसाधन से जुडे  उद्योग में विदेषी कंपनियों द्धारा निवेष के विरोध में निम्नलिखित तर्क दिया जाता हैः 1. बडे विदेषी कंपनी आने से भारतीय कंपनियों को छोडना पडेगा क्योंकि इनका उत्पादन का पैमाना बहुत बडा होता है 2. विदेषी कंपनी उच्च तकनीक अपनाती है तो भारतीय कंपनी प्रतियोगिता में नहीं टिक पायेंगे। 3. विदेषी कंपनी कच्चेमाल के लिए बडे किसान से सौदा करेंगें जिससे छोटे किसान की उपेक्षा होगी। 4. यदि इन उद्योगों का बहुत विकास होता है तो किसान खाद्यान्न फसल का उत्पादन करना कम कर देंगें

 

प्रथम तर्क के लिए यह कहा जाता है कि सहकारी समिति बनाकर या संयुक्त पंूजी निगम बनाकर एक बडा कारखाना लगा सकते है। एक तर्क यह दिया जता है कि सरकार जहां फसलों की उत्पादकता कम है वहां उत्पादकता बढाने का प्रयास कर सकती है।

 

इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में सब्जियों तथा फलों का संसाधन से जुडे  उद्योग में विदेषी कंपनियों द्धारा निवेष की अनुमति दी जानी चाहिए। कुछ समस्याएं उम्पन्न होगी जिसका समाधान निकाला जा सकता है। सरकार को मंडीकरण, संचार प्रणाली, स्थानीय श्रमिकों को प्रषिक्षण, षीत संग्रहण केंद्र की स्थापना महत्वपूर्ण कदम है। संसाधित वस्तुओं की गुणवत्ता के लिए ठोस नियम बनाना चाहिए। किसान और विदेषी कंपनी के बीच इकरारनामा के लिए एक आदर्ष संविदा पत्र तैयार करना चाहिए। सरकार को चाहिए किवे अपने देष के उद्यमियों को भी प्रोत्साहित करे। एक हवाला यह दिया जाता है कि समुद्री क्षेत्र में विदेषी कंपनियों को मछली पकडने की छूट देने के कारण भारतीय मछूआरे बेरोजगार हो गये है।

 

निष्कर्ष

वास्तव में जब भी सरकार विदेषी कंपनियों को भारत के किसी भी क्षेत्र में पंूजी लगाने की अनुमति देती है तो पहले यह सुनिष्चित कर ले कि विदेषी कंपनी निवेष से जो लाभ कमाती है उसका भारत के विकास में भी एक निष्चित योगदान हो यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार को यह अनुमति नहीं देनी चाहिए।

 

संदर्भ

1.       गुप्ता, पी.के., कृषि अर्थषास्त्र ,वंृदा पब्लिकेसंष, प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली।

2.       सोनी, आर .एन. मल्होत्रा, संगीता सोनी, कृष्णा , कृषि अर्थषास्त्र के मुख्य विषय, विषाल पब्लिीषिंग कंपनी, जालंधर. दिल्ली।

3.       सिन्हा, वी.सी , आर्ळिाक संवृद्धि और विकास मयूर पेपर बैक्स एवं नेषनल पब्लिरिूांग हाउस, दरिया गंज, नई दिल्ली।4

4.        Gulati, Ashok and  Bhatiya , (2002) Industrial credit of  Indian Agriculture: Defaults and policy Options. Seema

5.        Rao, C.H.H. (1994) Policy issues relating to irrigation and Rural credit in India, in G.S. Bhalla (ed)1994 Economic liberalization and Indian Agriculture, Institute of studies in Industrial Development, New Delhi.

6.        Gulati, Ashok and Seema Bhatia (2002) Institutional credit to Indian Agriculture: Defaults and policy Option.

7.        Satyasai  K.G. (2010) Equity in Indian Agriculture Credit Delivery, Departments of Economics, Analysis and Research NABARD ,               Mumbai.

 

 

 

 

Received on 07.04.2022         Modified on 11.05.2022

Accepted on 09.06.2022         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2022; 10(2): 97-104.